Saturday, 13 April 2013

ज़िंदगी तन्हा




ज़िंदगी यूं हुई बसर तन्हा ,
काफिला साथ और सफर तन्हा ,

अपने साये से चौंक जाते हैं ,
उम्र गुजरी है इस तरह ,

रात भर बोलतें गुजरी सन्नाटे  ,
रात काटे कोई किधर तन्हा ,

दिन गुजरते है नहीं लोगों में ,
रात होती नहीं बसर तन्हा ,

हमने दरवाजे तक तो देखा था ,
फिर ना जाने गए किधर तन्हा ।।   


                                                                  ---गुलज़ार साहब 



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