दिन-रात
तेरी आँखों से ही खुलते हैं
सवेरों के उफक,
तेरी आँखों से ही बंद होती है
ये सीप की रात,
तेरी आँखें हैं या सजदे में है
मसूम नमाज़ी,
पलकें खुलती हैं तो यौन गूंज के
उठती है नज़र,
जैसे मंदिर से जरस की चले
नमनाक हवा ,
और झुकती है तो बस जैसे
अज़ान खत्म हुई हो,
तेरी आँखें, तेरी ठहरी हुई
गमगीन सी आँखें,
तेरी आँखों से ही टहलीक हुई है सच्ची
तेरी आँखों से ही टहलीक हुई है हयात ।।
No comments:
Post a Comment